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होली में फट गई चोली

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मुझे त्योहारों में बहुत मज़ा आता है, खास तौर से होली में.

पर कुछ चीजे त्योहारों में गडबड है. जैसे मेरे मायके में मेरी मम्मी और उनसे भी बढ़के छोटी बहने.
कह रही थी कि मैं अपनी पहली होली मायके में मनाऊँ. वैसे मेरी बहनों की असली दिलचस्पी तो अपने जीजा जी के साथ होली खेलने में थी. परन्तु मेरे ससुराल के लोग कह रहे थे कि बहु की पहली होली ससुराल में ही होनी चाहिये.

मैं बड़ी दुविधा में थी. पर त्योहारों में गडबड से कई बार परेशानियां सुलझ भी जाती है. और ऐसा हुआ भी, इस बार होली २ दिन पड़ी. (दरअसल हिन्दुओं के सारे त्यौहार हिन्दी महीनों (जैसे- चैत्र, वैशाख….आदि) से मनाए जाते है और हिन्दी महीने तारीख से नही बल्कि तिथियों से चलते है. कई बार एक ही दिन और एक ही तारीख को दो तिथि मिल जाती है या एक ही तिथि दो दिनों तक रहती है. इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ.)

मेरी ससुराल में 14 मार्च को और

मायके में 15 को होली मनाई जानी थी.

मेरे मायके में जबर्दस्त होली होती है और वो भी दो दिन. तय हुआ कि मेरे घर से कोई आ के मुझे होली वाले दिन ले जाए और ‘ये’ होली के अगले दिन सुबह पहुँच जायेंगे. मेरे मायके में तो मेरी दो छोटी बहनों नमिता और श्वेता के सिवाय कोई था नहीं. मम्मी ने फिर ये प्लान बनाया कि मेरा ममेरा भाई, विक्रम, जो 11वी में पढ़ता था, वही होली के एक दिन पहले आ के ले जायेगा.

“विक्रम की चुन्नी” मेरी ननद सपना ने छेड़ा.

वैसे बात उसकी सही थी. वह बहुत कोमल, खूब गोरा, लड़कियों की तरह शर्मीला, बस यु समझ लीजिए कि जब से वो class 8 में पहुँचा, लड़के उसके पीछे पड़े रहते थे. यूं कहिये कि ‘नमकीन’ और highschool में उसकी टाइटिल थी, “है शुक्र कि तू है लड़का”, पर मैंने भी सपना को जवाब दिया, “अरे आएगा तो खोल के देख लेना, क्या है अंदर हिम्मत हो तो…”

“हाँ, पता चल जायेगा कि नुन्नी है या लंड(penis)” मेरी जेठानी ने मेरा साथ दिया.

“अरे भाभी उसका तो मुंगफली जैसा होगा, उससे क्या होगा हमारा..???” मेरी बड़ी ननद ने चिढ़ाया.

“अरे मूंगफली है या केला..??? ये तो पकड़ोगी तो पता चलेगा. पर मुझे अच्छी तरह मालूम है कि तुम लोगों ने मुझे ले जाने के लिये उसे बुलाने की शर्त इसीलिये रखी है कि तुम लोग उससे मज़ा लेना चाहती हो.” हँसते हुए मैं बोली.

“भाभी उससे मज़ा तो लोग लेना चाहते है, पर हम या कोई और ये तो होली में ही पता चलेगा. आपको अब तक तो पता चल ही गया होगा कि यहाँ के लोग पिछवाड़े के कितने शौक़ीन होते है..???” मेरी बड़ी ननद रानू जो शादी-शुदा थी, खूब मुह-फट्ट थी और खुल के मजाक करती थी.

बात उसकी सही थी.

मैं Flash-Back में चली गई………..

सुहागरात के 4-5 दिन के अंदर ही, मेरे पिछवाड़े की शुरुआत तो उन्होंने दो दिन के अंदर ही कर दी थी.
मुझे अब तक याद है, उस दिन मैंने सलवार-सूट पहन रखा था, जो थोड़ा Tight था और मेरे मम्मे(boobs) और नितम्ब खूब उभर के दिख रहे थे. रानू ने मेरे चूतडों पे चिकौटी काटते चिढ़ाया, “भाभी लगता है आपके पिछवाड़े में काफी खुजली मच रही है….? आज आपकी गाण्ड बचने वाली नहीं है, अगर आपको इन कपड़ो में भैया ने देख लिया तो…”
“अरे तो डरती हूँ क्या तुम्हारे भैया से..??? जब से आई हूँ लगातार तो चालू रहते है, बाकि और कुछ तो अब बचा नहीं…… ये भी कब तक बचेगी..???” चूतडों को मटका के मैंने जवाब दिया.
और तब तक ‘वो’ भी आ गए. उन्होंने एक हाथ से खूब कस के मेरे चूतडों को दबोच लिया और उनकी एक उंगली मेरे कसी सलवार में गाण्ड के Crack में घुस गई. उनसे बचने के लिये मैं रजाई में घुस गई अपनी सास के बगल में…..
‘वह’ भी रजाई में मेरी बगल में घुस के बैठ गए और अपना एक हाथ मेरे कंधे पे रख दिया. ‘उनकी’ बगल में मेरी जेठानी और छोटी ननद बैठी थी.
छेड़-छाड़ सिर्फ कोई ‘उनकी’ जागीर तो थी नहीं..??? सासू के बगल में मैं थोड़ा safe भी महसूस कर रही थी और रजाई के अंदर हाथ भी थोड़ा bold हो जाता है. मैंने पजामे के ऊपर हाथ रखा तो उनका खुटा पूरी तरह खड़ा था. मैंने शरारत से उसे हल्के से दबा दिया और उनकी ओर मुस्कुरा के देखा.
बेचारे…. चाह के भी….. अब मैंने और Bold हो के हाथ उनके पजामे में डाल के सुपाड़े को खोल दिया. पूरी तरह फूला और गरम था. उसे सहलाते-सहलाते मैंने अपने लंबे नाख़ून से उनके pi hole को छेड़ दिया. जोश में आके उन्होंने मेरे कबूतर(Boobs) कस के दबा दिए.
उनके चेहरे से उत्तेजना साफ़ झलक रही थी. वह उठ के बगल के कमरे में चले गए जो मेरी छोटी ननद का Study Room था. बड़ी मुश्किल से मेरी ननद और जेठानी ने अपनी मुस्कान दबायी.
“जाइये-जाइये भाभी, अभी आपका बुलावा आ रहा होगा.” शैतानी से मेरी छोटी ननद बोली.

हम दोनों का दिन-दहाड़े का ये काम तो सुहागरात के अगले दिन से ही चालू हो गया था. पहली बार तो मेरी जेठानी जबरदस्ती मुझे कमरे में दिन में कर आई और उसके बाद से तो मेरी ननदें और यहाँ तक की सासु जी भी……. सच्ची, बड़ा ही खुला मामला था मेरी ससुराल में……
एक बार तो मुझसे ज़रा सी देर हो गई तो मेरी सासु बोली, “बहु, जाओ ना… बेचारा इंतज़ार कर रहा होगा…”
“ज़रा पानी ले आना…” तुरन्त ही ‘उनकी’ आवाज सुनाई दी.
“जाओ, प्यासे की प्यास बुझाओ…” मेरी जेठानी ने छेड़ा.
कमरे में पँहुचते ही मैंने दरवाजा बंद कर दिया. उनको छेड़ते हुए, दरवाजा बंद करते समय, मैंने उनको दिखा के सलवार से छलकते अपने भारी चूतडों को मटका दिया. फिर क्या था.? वो भी कहाँ कम पड़ने वाले थे.? पीछे आके उन्होंने मुझे कस के पकड़ लिया और दोनों हाथों से कस-कस के मेरे मम्मे दबाने लगे. मेरे कमसिन कबूतर छटपटाने लगे. ‘उनका’ पूरी तरह उत्तेजित हथियार भी मेरी गाण्ड के दरार पे कस के रगड़ रहा था. लग रहा था, सलवार फाड़ के घुस जायेगा.
मैंने चारों ओर नज़र दौडाई. कमरे में कुर्सी-मेज़ के अलावा कुछ भी नहीं था.
मैं अपने घुटनों के बल पे बैठ गई और उनके पजामे का नाडा खोल दिया. फन-फ़ना कर उनका लंड बहार आ गया. सुपाडा अभी भी खुला था, पहाड़ी आलू की तरह बड़ा और लाल. मैंने पहले तो उसे चूमा और फिर बिना हाथ लगाये अपने गुलाबी होठों के बीच ले चूसना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे मैं Lolypop की तरह उसे चूस रही थी और मेरी जीभ उनके Pi Hole को छेड़ रही थी.
उन्होंने कस के मेरे सर को पकड़ लिया. अब मेरा एक मेहन्दी लगा हाथ उनके लंड के Base को पकड़ के हल्के से दबा रहा था और दूसरा उनके अंडकोष (Balls) को पकड़ के सहला और दबा रहा था. जोश में आके मेरा सर पकड़ के वह अपना मोटा लंड अंदर-बाहर कर रहे थे. उनका आधे से ज्यादा लंड अब मेरे मुँह में था. सुपाडा हलक पे धक्के मार रहा था. जब मेरी जीभ उनके मोटे कड़े लंड को सहलाती और मेरे गुलाबी होठों को रगड़ते, घिसते वो अंदर जाता…. खूब मज़ा आ रहा था मुझे. मैं खूब कस-कस के चूस रही थी, चाट रही थी.
उस कमरे में मुझे चुदाई का कोई रास्ता तो दिख नहीं रहा था. इसलिए मैंने सोचा कि मुख-मैथुन कर के ही काम चला लू.
पर उनका इरादा कुछ और ही था.
“कुर्सी पकड़ के झुक जाओ…” वो बोले.
अंधा क्या चाहे…. दो आँखें….. मैं झुक गई.
पीछे से आके उन्होंने सलवार का नाडा खोल के उसे घुटनों के नीचे सरका दिया और कुर्ते को ऊपर उठा के Bra खोल दी. अब मेरे मम्मे आजाद थे. मैं सलवार से बाहर निकलना चाहती थी, पर उन्होंने मना कर दिया कि जैसे झट से कपडे फिर से पहन सकते है, अगर कोई बुला ले तो…..
इस आसन में मुझे वो पहले भी चोद चुके थे पर सलवार पैर में फँसी होने के कारण मैं टाँगे ठीक से फैला नहीं पा रही थी और मेरी चुत और भी ज्यादा कस चुकी थी.
शायद वो ऐसा ही चाहते थे.
एक हाथ से वो मेरा जोबन (Boobs) मसल रहे थे और दूसरे से उन्होंने मेरी चुत में उँगली करनी शुरू कर दी. चुत तो मेरी पहले ही गीली हो रही थी, थोड़ी देर में ही वो पानी-पानी हो गई. उन्होंने अपनी उँगली से मेरी चुत को फैलाया और सुपाडा वहाँ Center कर दिया. फिर जो मेरी पतली कमर को पकड़ के उन्होंने कस के एक करारा धक्का मारा तो मेरी चुत को रगड़ता, पूरा सुपाडा अंदर चला गया.
दर्द से मैं तिलमिला उठी. पर जब वो चुत के अंदर घिसता तो मज़ा भी बहुत आ रहा था. दो चार धक्के ऐसे मारने के बाद उन्होंने मेरी चुचियों को कस-कस के रगड़ते, मसलते चुदाई शुरू कर दी. जल्द ही मैं भी मस्ती में आ कभी अपनी चुत से उनके मोटे हलब्बी लंड पे सिकोड़ देती, कभी अपनी गाण्ड मटका के उनके धक्के का जवाब देती. साथ-साथ कभी वो मेरी Clit, कभी Nipples पिंच करते और मैं मस्ती में गिन्गिना उठती.
तभी उन्होंने अपनी वो उँगली, जो मेरी चुत में अंदर-बाहर हो रही थी और मेरी चुत के रस से अच्छी तरह गीली थी, को मेरी गाण्ड के छेद पे लगाया और कस के दबा के उसकी Tip अंदर घुसा दी.
“हे…अंदर नहीं……उँगली निकाल लो…..प्लीज़…” मैं मना करते बोली.
पर वो कहा सुनने वाले थे.? धीरे-धीरे उन्होंने पूरी उँगली अंदर कर दी.
अब उन्होंने चुदाई भी Full Speed में शुरू कर दी थी. उनका बित्ते भर लंबा मुसल पूरा बाहर आता और एक झटके में उसे वो पूरा अंदर पेल देते. कभी मेरी चुत के अंदर उसे गोल-गोल घुमाते. मेरी सिसकारियाँ तो कस-कस के निकल रही थी.
उँगली भी लंड के साथ मेरी गाण्ड में अंदर-बाहर हो रही थी. लंड जब बुर से बाहर निकलता तो वो उसे Tip तक बाहर निकालते और फिर उँगली लंड के साथ ही पूरी तरह अंदर घुस जाती. पर उस धक्का पेल चुदाई में मैं गाण्ड में उँगली भूल ही चुकी थी.
जब उन्होंने गाण्ड से गप से उँगली बाहर निकली तो मुझे पता चला. सामने मेरी ननद की टेबल पर Fair & Lovely Cream रखी थी. उन्होंने उसे उठा के उसका नोज़ल सीधे मेरी गाण्ड में घुसा दिया और थोड़ी सी क्रीम दबा के अंदर घुसा दी. और जब तक मैं कुछ समझती उन्होंने अबकी दो उंगलियां मेरी गाण्ड में घुसा दी. कुछ पता नहीं चल पा रहा था कि क्या करूँ.? दर्द से चिल्लाऊं या चुदाई की आहें भरूं.
दर्द से मैं चीख उठी. पर अबकी बिन रुके पूरी ताकत से उन्होंने उसे अंदर घुसा के ही दम लिया.
“हे…निकालो ना…. क्या करते हो.? उधर नहीं…प्लीज़….चुत चाहे जित्ती बार चोद लो ओह…” मैं चीखी. लेकिन थोड़ी देर में चुदाई उन्होंने इत्ती तेज कर दी कि मेरी हालत खराब हो गई. और खास तौर से जब वो मेरी Clit मसलते, मैं जल्द ही झड़ने के कगार पर पँहुच गई तो उन्होंने चुदाई रोक दी.
मैं भूल ही चुकी थी कि जिस रफ़्तार से लंड मेरी बुर में अंदर-बाहर हो रहा था, उसी तरह मेरी गाण्ड में उँगली अंदर-बाहर हो रही थी.
लंड तो रुका हुआ था पर गाण्ड में उँगली अभी भी अंदर-बाहर हो रही थी. एक मीठा-मीठा दर्द हो रहा था पर एक नए किस्म का मज़ा भी मिल रहा था. उन्होंने कुछ देर बाद फिर चुदाई चालू कर दी.
दो-तीन बार वो मुझे झड़ने के कगार पे ले जाके रोक देते पर गाण्ड में दोनों उँगली करते रहते और अब मैं भी गाण्ड, उँगली के धक्के के साथ आगे-पीछे कर रही थी.
और जब कुछ देर बाद उँगली निकली तो क्रीम के Tube का नोज़ल लगा के पूरी की पूरी Tube मेरी गाण्ड में खाली कर दी. अपने लंड पर भी क्रीम लगा के उसे मेरी गाण्ड के छेद पे लगा दिया और अपने दोनों ताकतवर हाथों से मेरे चूतडो को पकड़, कस के मेरी गाण्ड का छेद फैला दिया. उनका मोटा सुपाडा मेरी गाण्ड के दुबदुबाते छेद से सटा था. और जब तक मैं समझती, उन्होंने मेरी पतली कमर पकड़ के कस से पूरी ताकत से तीन-चार धक्के लगा दिये…..
“उईईई….माँआआआआ…..” मैं दर्द से बड़े जोर से चिल्लाई. मैंने अपने होंठ कस के काट लिये पर लग रहा था मैं दर्द से बेहोश हो जाऊँगी. बिना रुके उन्होंने फिर कस के दो-तीन धक्के लगाये और मैं दर्द से बिलबिलाते हुए फिर चीखने लगी. मैंने अपनी गाण्ड सिकोड़ने की कोशिश की और गाण्ड पकड़ने लगी पर तब तक उनका सुपाडा पूरी तरह मेरी गाण्ड में घुस चुका था और गाण्ड के छल्ले ने उसे कस के पकड़ रखा था. मैं खूब अपने चूतडो को हिला और पटक रही थी पर जल्द ही मैंने समझ लिया कि वो अब मेरी गाण्ड से निकलने वाला नहीं है. उन्होंने भी अब कमर छोड़ मेरी चुचियाँ पकड़ ली थी और उसे कस के मसल रहे थे. दर्द के मारे मेरी हालत खराब थी. पर थोड़ी देर में चुचियों के दर्द के आगे गाण्ड का दर्द मैं भूल गई.
अब बिना लंड को और धकेले, अब वो प्यार से कभी मेरी चुत सहलाते, कभी चने (Clit) को छेड़ते. थोड़ी देर में मस्ती से मेरी हालत खराब हो गई. अब उन्होंने अपनी दो उंगलियां मेरी चुत में डाल दी और कस-कस के लंड की तरह उसे चोदने लगे.
जब मैं झड़ने के कगार पे आ जाती तो वो रुक जाते. मैं तड़प रही थी.
मैंने उनसे कहा, “मुझे झड़ने दो…” तो वो बोले, “तुम मुझे अपनी ये मस्त गाण्ड मार लेने दो.” मैं अब पागल हो रही थी.
मैं बोली, “हा राजा चाहे गाण्ड मार लो, पर…………”
वो मुस्कुरा के बोले, “जोर से बोल….”
और मैं खूब जोर से बोली, “मेरे राजा, मार लो मेरी गाण्ड, चाहे आज फट जाये… पर मुझे झाड़ दो….. आह्ह्ह्ह्ह…..उम्म्म्म्म्म्म….” और उन्होंने मेरी चुत के भीतर अपनी उँगली इस तरह से रगड़ी जैसे मेरे G-Point को छेड़ दिया हो और मैं पागल हो गई. मेरी चुत कस-कस के काँप रही थी और मैं झड रही थी, रस छोड़ रही थी.
और मौके का फायदा उठा के उन्होंने मेरी चुचियाँ पकडे-पकडे कस-कस के धक्के लगाये और पूरा लंड मेरी कोरी गाण्ड में घुसेड़ दिया. दर्द के मारे मेरी गाण्ड फटी जा रही थी. कुछेक देर रुक के उनका लंड पूरा बाहर आके मेरी गाण्ड मार रहा था.
करीब आधे घन्टे से भी ज्यादा गाण्ड मरने के बाद ही वो झडे. और उनकी उंगलियां मेरा चुत मंथन कर रही थी और मैं भी साथ-साथ झड़ी.
उनका वीर्य मेरी गाण्ड के अंदर से निकल के मेरे चूतडो पे आ रहा था. उन्होंने अपने लंड निकाला भी नहीं था की मेरी ननद की आवाज़ आई, “भाभी, आपका फोन….”

मेरी ननद की आवाज़ आई, “भाभी, आपका फोन….”

जल्दी से मैंने सलवार चढाई, कुरता सीधा किया और बाहर निकली. दर्द से चला भी नहीं जा रहा था. किसी तरह सासु जी के बगल में पलंग पे बैठ के बात की. मेरी छोटी ननद ने छेड़ा, “क्यों भाभी, बहुत दर्द हो रहा है.?”
मैंने उसे उस वक्त खा जाने वाली नज़रों से देखा. सासु बोली, “बहु, लेट जाओ…” लेटते ही जैसे मेरे चूतडो में करंट दौड़ गया हो. एक भयंकर दर्दभरी टीस उठी. उन्होंने समझाया, “करवट हो के लेट जाओ, मेरी ओर मुँह कर के…” और मेरी जेठानी से बोली, “तेरा देवर बहुत बदमाश है, मैं फूल-सी बहु इसीलिए थोड़ी ले आई थी.”
“अरी माँ, इसमें भैया का क्या दोष.? मेरी प्यारी भाभी है ही इत्ती प्यारी और फिर ये भी तो मटका-मटका कर……..” उनकी बात काट के मेरी ननद बोली.
“लेकिन इस दर्द का एक ही इलाज है, थोड़ा और दर्द….. कुछ देर के बाद आदत पड़ जाती है.” मेरा सर प्यार से सहलाते हुए मेरी सासु जी धीरे से मेरे कान में बोली.
“लेकिन भाभी भैया को क्यों दोष दे? आपने ही तो उनसे कहा था मारने के लिये…… खुजली तो आपको ही हो रही थी.” सब लोग मुस्कुराने लगे और मैं भी अपनी गाण्ड में हो रही टीस के बावजूद मुस्कुरा उठी.
सुहागरात के दिन से ही मुझे पता चल गया था की यहाँ सब कुछ काफी खुला हुआ है. तब तक वो आके मेरे बगल में रजाई में घुस गए. सलवार तो मैंने ऐसे ही चढा ली थी. इसलिए आसानी से उसे उन्होंने मेरे घुटने तक सरका दी और मेरे चूतडो को सहलाने लगे.
मेरी जेठानी उनसे मुस्कुराकर छेड़ते हुए बोली, “देवर जी, आप मेरी देवरानी को बहोत तंग करते है और तुम्हारी सजा ये है की आज रात तक अब तुम्हारे पास ये दुबारा नहीं जायेगी.”
मेरी सासु जी ने उनका साथ दिया. जैसे उनके जवाब में उन्होंने मेरे गाण्ड के बीच में छेदती उँगली को पूरी ताकत से एक ही झटके में मेरी गाण्ड में पेल दिया. गाण्ड के अंदर उनका वीर्य लोशन की तरह काम कर रहा था. फिर भी मेरी चीख निकल गई. मुस्कराहट दबाती हुई सासु जी किसी काम का बहाना बना बाहर निकल गई. लेकिन मेरी ननद कहाँ चुप रहने वाली थी.
वो बोली, “भाभी, क्या हुआ.? किसी चींटे ने काट लिया क्या.?”
“अरे नहीं लगता है, चीटा अंदर घुस गया है.” छोटी वाली बोली.
“अरे मीठी चीज होगी तो चीटा लगेगा ही. भाभी आप ही ठीक से ढँक कर नहीं रखती हो क्या.?” बड़ी वाली ने फिर छेड़ा.
तब तक उन्होंने रजाई के अंदर मेरा कुरता भी पूरी तरह से ऊपर उठा के मेरी चूची दबानी शुरू कर दी थी और उनकी उँगली मेरी गाण्ड में गोल-गोल घूम रही थी.
“अरे चलो बेचारी को आराम करने दो, तुम लोगों को चींटे से कटवाउंगी तो पता चलेगा.” ये कह के मेरी जेठानी दोनों ननदों को हांक के बाहर ले गई. लेकिन वो भी नहीं थी. ननदों को बाहर करके वो आई और सरसों के तेल की शीशी रखती बोली, “ये लगाओ, Anti-Septic भी है.”
तब तक उनका हथियार खुल के मेरी गाण्ड के बीच धक्का मार रहा था. निकल कर बाहर से उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया.
फिर क्या था.? उन्होंने मुझे पेट के बल लिटा दिया और पेट के नीचे दो तकिये लगा के मेरे चूतड़ ऊपर उठा दिए. सरसों का तेल अपने लंड पे लगा के सीधे शीशी से ही उन्होंने मेरी गाण्ड के अंदर डाल दिया.
वो एक बार झड़ ही चुके थे इसलिए आप सोच ही सकते है इस बार पूरा एक घंटा गाण्ड मारने के बाद ही वो झडे और जब मेरी जेठानी शाम की चाय ले आई तो भी उनका मोटा लंड मेरी गाण्ड में ही घुसा था.
उस रात फिर उन्होंने दो बार मेरी गाण्ड मारी और उसके बाद से हर हफ्ते दो-तीन बार मेरे पिछवाड़े का बाजा तो बज ही जाता है.

मेरी बड़ी ननद रानू मुझे Flash-back से वापस लाते हुए बोली, “क्या भाभी, क्या सोच रही है अपने भाई के बारे में..???”
“अरे नहीं तुम्हारे भाई के बारे में…” तब तक मुझे लगा कि मैं क्या बोल गई.? और मैं चुप हो गई.
“अरे भाई नहीं अब मेरे भाईयों के बारे में सोचिये, फागुन लग गया है और अब आपके सारे देवर आपके पीछे पड़े है. कोई नहीं छोड़ने वाला आपको और ननदोई है सो अलग..” वो बोली.
“अरे तेरे भाई को देख लिया है तो देवर और ननदोई को भी देख लूंगी……” गाल पे चिकौटी काटती मैं बोली.
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होली की पहली शाम को वो आया………………..

होली के पहले वाली शाम को वो आया……..
पतला, गोरा, छरहरा किशोर. अभी रेखा आई नहीं थी. सबसे पहले मेरी छोटी ननद मिली और उसे देखते ही वो चालू हो गई, ‘चिकना’
वो भी बोला, “चिकनी…” और उसके उभरते उभारों को देख के बोला, “बड़ी हो गई है.” मुझे लग गया कि जो ‘होने’ वाला है वो ‘होगा’. दोनों में छेड़-छाड़ चालू हो गई.
वो उसे ले के जहाँ उसे रुकना था, उस कमरे में ले गई. मेरे bed room से एकदम सटा, Ply का Partition कर के एक कमरा था उसी में उसके रुकने का इंतज़ाम किया गया था. उसका bed भी, जिस Side हम लोगों का bed लगा था, उसी से सटा था.
मैंने अपनी ननद से कहा, “अरे कुछ पानी-वानी भी पिलाओगी बेचारे को या छेड़ती ही रहोगी..???”
वो हँस के बोली, “भाभी अब इसकी चिंता मेरे ऊपर छोड़ दीजिए.” और गिलास दिखाते हुए कहा, “देखिये इस साले के लिये खास पानी है.”
जब मेरे भाई ने हाथ बढ़ाया तो उसने हँस के गिलास का सारा पानी, जो गाढा लाल रंग था, उसके ऊपर उड़ेल दिया. बेचारे की सफ़ेद शर्ट पर…. लेकिन वो भी छोड़ने वाला नहीं था. उसने उसे पकड़ के अपने कपड़े पे लगा रंग उसकी frock पे रगड़ने लगा और बोला, “अभी जब मैं डालूँगा ना अपनी पिचकारी से रंग, तो चिल्लाओगी”
वो छूटते हुए बोली, “बिल्कुल नहीं चिल्लाउंगी, लेकिन तुम्हारी पिचकारी में कुछ रंग है भी कि सब अपनी बहनों के साथ खर्च कर के आ गए हो..???”
वो बोला, “सारा रंग तेरे लिये बचा के लाया हूँ, एकदम गाढ़ा सफ़ेद”
उन दोनों को वही छोड़ के मैं गई रसोईघर में जहाँ होली के लिये गुझिया बन रही थी और मेरी सास, बड़ी ननद और जेठानी थी. गुझिया बनाने के साथ-साथ आज खूब खुल के मजाक, गालियाँ चल रही थी. बाहर से भी कबीर गान, गालियों कि आवाज़ें, फागुनी बयार में घुल-घुल के आ रही थी.
ठण्डाई बनाने के लिये भांग रखी थी और कुछ बर्फी में डालने लिये.
मैंने कहा, “कुछ गुझिया में भी डाल के बना देते है, लोगों को पता नही चलेगा.?!!! और फिर खूब मज़ा आएगा.”
मेरी ननद बोली, “हाँ, और फिर हम लोग वो आप को खिला के नंगा नचायेंगे…..”
मैं बोली, “मैं इतनी भी बेवकुफ नहीं हूँ, भांग वाली और बिना भांग वाली गुझिया अलग-अलग डब्बे में रखेंगे.”
हम लोगों ने तीन डिब्बों में, एक में Double Dose वाली, एक में Normal भांग की और तीसरे में बिना भांग वाली रखी. फिर मैं सब लोगों को खाना खाने के लिये बुलाने चल दी.
मेरा भाई भी उनके साथ बैठा था. साथ में बड़ी ननद के Husband मेरे ननदोई भी….. उनकी बात सुनके मैं दरवाजे पे ही एक मिनट के लिये ठिठक के रुक गई और उनकी बात सुनने लगी. मेरे भाई को उन्होंने सटा के, Almost अपने गोद में (खींच के गोस में ही बैठा लिया). सामने ननदोई जी एक बोतल (दारू की) खोल रहे थे. मेरे भाई के गालों पे हाथ लगा के बोले, “यार तेरा साला तो बड़ा मुलायम है..”
“और क्या एकदम मक्खन मलाई….” दूसरे गाल को प्यार से सहलाते ‘ये’ बोले.
“गाल ऐसा है तो फिर गाण्ड तो…… क्यों साले कभी मरवाई है क्या..??” बोतल से सीधे घुट लगाते मेरे ननदोई बोले और फिर बोतल ‘उनकी’ ओर बढ़ा दी.
मेरा भाई मचल गया और मुँह फूला के अपने जीजा से बोला, “देखिये जीजाजी, अगर ये ऐसी बात करेंगे तो….”
उन्होंने बोतल से दो बड़ी घुट ली और बोतल ननदोई को लौटा के बोले, “जीजा, ऐसे थोड़े ही पूछते है.!! अभी कच्चा है, मैं पूछता हूँ…”
फिर मेरे भाई के गाल पे प्यार से एक चपत मार के बोले, “अरे ये तेरे जीजा के भी जीजा है, मजाक तो करेंगे ही…. क्या बुरा मानना..?? फिर होली का मौका है. तू लेकिन साफ-साफ बता, तू इत्ता गोरा चिकना है लौंडियों से भी ज्यादा नमकीन, तो मैं ये मान ही नहीं सकता कि तेरे पीछे लड़के ना पड़े हो.!!! तेरे शहर में तो लोग कहते है कि अभी तक इसलिए बड़ी लाइन नहीं बनी कि लोग छोटी लाइन के शौक़ीन है.” और उन्होंने बोतल ननदोई को दे दी.
ना नुकुर कर के उसने बताया कि कई लड़के उसके पीछे पड़े तो थे और कुछ ही दिन पहले वो साईकिल से जब घर आ रहा था तो कुछ लडको ने उसे रोक लिया और जबरन स्कुल के सामने एक बांध है, उसके नीचे गन्ने के खेत में ले गए. उन लोगों ने तो उसकी पेन्ट भी सरका के उसे झुका दिया था. लेकिन बगल से एक टीचर की आवाज सुने पड़ी तो वो लोग भागे.
“तो तेरी कोरी है अभी..??? चल हम लोगों की किस्मत… कोरी मारने के मज़ा ही और है.” ननदोई बोले और अबकी बोतल उसके मुँह से लगा दिया. वो लगा छटपटाने….
उन्होंने उसके मुँह से बोतल हटाते हुए कहा, “अरे जीजा अभी से क्यों इसको पीला रहे है..???” (लेकिन मुझको लग गया था कि बोतल हटाने के पहले जिस तरह से उन्होंने झटका दिया था, दो-चार घूंट तो उसके मुँह में चला ही गया.) और खुद पिने लगे.
“कोई बात नहीं…कल जब इसे पेलेंगे तो पिलायेंगे….” संतोष कर ननदोई बोले.
“अरे डरता क्यों है.??” दो घुट ले उसके गाल पे हाथ फेरते वो बोले, “तेरी बहना की भी तो कोरी थी, एकदम कसी… लेकिन मैंने छोड़ी क्या.?? पहले उँगली से जगह बनाई, फिर क्रीम लगा के, प्यार से सहला के, धीरे-धीरे और एक बार जब सुपाडा घुस गया, वो चीखी, चिल्लाई लेकिन…. अब हर हफ्ते उसकी पीछे वाली दो-तीन बार तो कम से कम…..” और उन्होंने उसको फिर से खींच के अपनी गोद में सेट करके बैठाया.
दरवाजे की फाँक से साफ़ दिख रहा था. उनका पजामे जिस तरह से तना था मैं समझ गई कि उन्होंने Center करके सीधे वहीँ लगा के बैठा लिया उसको. वो थोड़ा कुनमुनाया, पर उनकी पकड़ कितनी तगड़ी थी, ये मुझसे बेहतर और कौन जान सकता था.? उन्होंने बोतल अब ननदोई को बढ़ा दी…
“यार तेरी बीवी यानी कि मेरी सलहज के चूतड़ इतने मस्त है कि देख के खड़ा हो जाता है… और ऊपर से गदराई उभरी-उभरी चुचियाँ….हाय….. बड़ा मज़ा आता होगा तुझे उसकी चूची पकड़ के गाण्ड मारने में..है ना.???”
बोतल फिर ननदोई जी ने वापस कर दी. एक घुट मुँह से लगा के ‘ये’ बोले, “एकदम सही कहते है आप… उसके दोनों मम्मे बड़े कड़क है… मज़ा भी बहोत आता है उसकी गाण्ड मारने में…..”
“अरे बड़े किस्मत वाले हो साले जी, बस एक बार मुझे मिल जाये ना गंगा कसम जीवन धन्य हो जाये…. समझ लो कि मज़ा आ जाये यार……” ननदोई जी ने बोतल उठा के कस के लंबी घुट लगाई… अपनी तारीफ सुन के मैं भी खुश हो गई थी… मेरी ‘गिलहरी’ भी अब फुदकने लगी थी.
“अरे तो इसमें क्या…??? कल होली भी है और रिश्ता भी…..” बोतल अब उनके पास थी. मुझे भी कोई ऐतराज नहीं था. मेरा कोई सगा देवर था नही, फिर ननदोई जी भी बहुत रसीले दिख रहे थे.
“तेरे तो मज़े है यार….कल यहाँ होली और परसों ससुराल में…. किस उम्र की है तेरी सालियाँ…..?” ननदोई जी अब पुरे रंग में थे.
‘इन्होने’ बोला कि “बड़ी वाली 18 (****) की है और दूसरी थोड़ी छोटी है…(मेरी छोटी ननद का नाम ले के बोले) उसके बराबर होगी…”
“अरे तब तो चोदने लायक वो भी हो गई है……” मज़े लेते हुए ननदोई जी बोले.
“अरे उससे भी 4-5 महीने छोटी है छुटकी…” मेरा भाई जल्दी से बोला.
अबतक ‘इन्होने’ और ननदोई ने मिल कर उसे 8-10 घुट पीला ही दिया था. वो भी अब शर्म-लिहाज छोड़ चुका था…
“अरे हां….साले साहब से ही पूछिये ना उनकी बहनों का हाल. इनसे अच्छा कौन बताएगा.????” ‘ये’ बोले.
“बोल साले, बड़ी वाली की चुचियाँ कितनी बड़ी है…???”
“वो…वो उमर में मुझसे एक साल बड़ी है और उसकी…..उसकी अच्छी है….थोड़ी….. मेरा मतलब है… दीदी के जितनी तो नहीं….हां दीदी से थोड़ी छोटी….” हाथ के इशारे से उसने बताया….
मैं शर्मा गई….चुत पानी-पानी हो चुकी थी….लेकिन अच्छा भी लगा सुन के कि मेरा ममेरा भाई मेरे उभारों पे नज़र रखता है….
“अरे तब तो बड़ा मज़ा आयेगा तुझे उसके जोबन (Boobs) दबा-दबा के रंग लगाने में….” ननदोई ‘इनसे’ बोले और फिर मेरे भाई से पूछा, “और छुटकी की….????”
“वो उसकी…. उसकी अभी…..” ननदोई बेताब हो रहे थे…. वो बोले, “अरे साफ-साफ बता, उसकी चुचियाँ अभी आयी है कि नहीं..???”
हे राम…. चुत में तो जैसे सैलाब उमड़ आया हो…… मुझसे रहा न गया, दो-तीन उंगलियां गचाक से चुत में पेल दी……
“आयीं तो है बस अभी….. लेकिन उभार रही है… छोटी है बहुत….” वो बेचारा बोला…
“अरे उसी में तो असली मज़ा है…. चुचियाँ उठान में हो तो मीजने में, पकड़ के पेलने में…. चूतड़ कैसे है..???”
“चूतड़ तो दोनों सालियों के बड़े सेक्सी है…. बड़ी के उभरे-उभरे और छुटकी के कमसिन लौण्डों जैसे….. मैंने पहले तय कर लिया है कि होली में अगर दोनों सालियों की कच-कचा के गाण्ड ना मारी…….”
“तुम जब होली से लौट के आओ तो अपनी एक साली को साथ ले आना…उसी छुटकी को….फिर यहाँ तो रंग पंचमी को और जबरदस्त होली होती है. उसमे जम के होली खेलेंगे साली के साथ…..”
आधी से ज्यादा बोतल खाली हो चुकी थी और दोनों नशे के सुरूर में थे. थोड़ा बहुत मेरे भाई को भी चढ़ चुकी थी….
“एकदम….जीजा, ये अच्छा Idea दिया आपने. बड़ी वाली का तो Board का इम्तिहान है लेकिन छुटकी तो अभी 9वीं में है. 10-15 दिन के लिये ले आयेंगे उसको…..”
“अभी वो छोटी है…..” वो फिर जैसे किसी Record की सुई अटक गई हो बोला.
“अरे क्या छोटी-छोटी लगा रखी है..??? उस कच्ची कली की फुद्दी को पूरा भोसड़ा बना के 15 दिन बाद भेजेंगे यहाँ से, चेहे तो तुम फ्रोक उठा के खुद देख लेना…” बोतल मेज पे रखते ‘ये’ बोले.
“और क्या..??? जो अभी शर्मा रही होगी ना, जब जायेगी तो मुँह से फूल की जगह गालियाँ झड़ेंगी, रंडी को भी मात कर देगी वो साली….” ननदोई बोले.

मैं समझ गई कि अब ज्यादा चढ़ गई है दोनों को, और फिर उन लोगों की बातें सुनकर मेरा भी मन मचल रहा था. मैं अंदर गई और बोली, “चलिए खाने के लिये देर हो रही है..!!”
ननदोई उसके गाल पे हाथ फेर के बोले, “अरे इतना मस्त भोजन तो हमारे पास ही है..”
वो तीनों खाना खा रहे थे लेकिन खाने के साथ-साथ ननदों ने जम के मेरे भाई का मज़ाक उड़ाया और गालियां भी दी, खास कर के छोटी ननद ने. मैंने भी ननदोई-सा को नहीं बख्शा और खाना परोसने के साथ में जान-बुझ के उनके सामने आँचल ढुलका देती.
Low Cut चोली में से मेरे जोबन को देख कर ननदोई की हालत खराब थी. जब मैं हाथ धुलाने के लिये उन्हें ले गई तब मेरे चूतड़ कुछ ज्यादा ही मटक रहे थे, मैं आगे-आगे और वो मेरे पीछे-पीछे, मुझे पता थी उनकी हालत. जब वो झुके तो मैंने उनकी मांग में चुटकी से गुलाल सिंदूर की तरह डाल दिया और बोली, “सदा सुहागन रहो, बुरा न मानो होली है.”
उन्होंने मुझे कस के भींच लिया. उनके हाथ सीधे मेरे आँचल के ऊपर से मेरे गदराए जोबन पे और उनका पजामा सीधे मेरे पीछे दरारों के बीच में. मैं समझ गई कि उनका ‘खुटा’ भी उनके साले से कम नहीं है. मैं किसी तरह छूटते हुए बोली, “समझ गई मैं, जाइये ननद जी इंतज़ार कर रही होंगी. चलिए कल होली के दिन देख लूंगी आपकी ताकत भी, चाहे जैसे जितनी बार डालियेगा, पीछे नहीं हटूंगी.”

जब मैं रसोईघर में गई तो वहाँ मेरी ननद कड़ाही की कालख निकल रही थी.
मैंने पूछा तो बोली, “आपके भाई के श्रृंगार के लिये, लेकिन भाभी उसे बताइयेगा नहीं..!?! ये मेरे-उसके बीच की बात है.”
इस पर हँस के मैं बोली, “एक दम नहीं, लेकिन अगर कही पलट के उसने डाल दिया तो….. ननद रानी बुरा मत मानना.!”
वो हँस के बोली, “अरे भाभी, साले की बात का क्या बुरा मानना..??? एक दम नहीं.. और फिर होली तो है ही डालने-डलवाने का त्यौहार. लेकिन आप भी समझ जाइये ये भी गाँव की होली है, यहाँ कोई भी ‘चीज़’ छोड़ी नहीं जाती होली में.”
उसने ‘चीज़’ पर कुछ ज्यादा ही ज़ोर लगाया था.

उसकी बात पे मैं सोचती, मुस्कुराती कमरे में गई तो ‘ये’ तैयार बैठे थे………………..

उसकी बात पे मैं सोचती, मुस्कुराती कमरे में गई तो ‘ये’ तैयार बैठे थे…………….

बची-कुची बोतल भी ‘इन्होने’ खाली कर दी थी. साड़ी उतारते-उतारते उन्होंने पलंग पर खींच लिया और चालू हो गए.
सारी रात चोदा ‘इन्होने’ लेकिन मुझे झड़ने नही दिया. जब से मैं आई थी ये पहली रात थी जब मैं झड नहीं पाई, वरना हर रात कम से कम 5-6 बार. इतनी चुदासी कर दिया मुझे कि वो कस-कस के मेरी पनियाई चूत चुसते और जैसे ही मैं झड़ने के करीब होती, कच-कचा के मेरी चुचियाँ काट लेते. दर्द से मैं बिलबिला पड़ती, मेरी चीख निकल उठती. मेरे मन में आया भी कि बगल के कमरे में मेरा भाई लेटा है और वो मेरी हर चीख सुन रहा होगा. पर तब तक उन्होंने चूचकों को भी कस के काट लिया, नाख़ून से नोच लिया. उनकी ये नोच-खसोट और काटना मुझे और मस्त कर देता था. सब कुछ भूल के मैं फिर चीख पड़ी. मेरी चीखें उनको भी जोश से पागल बना देती थी. एक बार में ही उन्होंने बलिष्ठ, लम्बा, लोहे की रोड जैसा सख्त लंड मेरी चूत में जड़ तक पेल दिया.
जैसे ही वो मेरी बच्चेदानी से टकराया, मैं मस्ती से सीत्कार उठी, “हाँ राजा, हा चोद….चोद मुझे….ऐसे ही….कस-कस के पेल दे अपना मुसल मेरी चूत में.”
और ‘ये’ भी मेरी चुचियाँ मसलते हुए बोलने लगे, “ले ले रानी ले. बहुत प्यासी है तेरी चूत ना… घोंट मेरा लौड़ा..!!!”
मेरी सिसकियाँ भी बगल वाले कमरे में सुनाई पड़ रही होंगी, इसका मुझे पूरा अंदाजा था. लेकिन उस समय तो बस यही मन कर रहा था कि ‘वो’ चोद-चोद कर के बस झाड़ दे मेरी चूत. जैसे ही मैं झड़ने के कगार पर पहुँची, पता नही उन्हें कैसे पता चल गया और उन्होंने लंड निकाल लिया.
मैं चिल्लाती रही, “राजा बस एक बार मुझे झाड़ दो, बस एक मिनट के लिये….”
लेकिन आज उनके सर पर दूसरा ही भुत सवार हो गया. उन्होंने मुझे उल्टा कर के कुतिया जैसा बना दिया और बोले, “चल साली पहले गाण्ड मरा…”
एक धक्के में ही आधा लंड अंदर, “ओह्ह…ओह..फटी…फट गई..मेरी गाण्ड.” मैं चीखी कस के.
पर उन्होंने मेरे मस्त चूतड़ों पे दो हाथ कस के जमाए और बोले, “यार, क्या मस्त गाण्ड है तेरी….” साथ-साथ पूछा, “होली में चल तो रहा हूँ ससुरी पर ये बोल कि सालियां चुदवाएगी कि नहीं..???”
मैं चूतड़ों को मटकाते हुए बोली, “अरे सालियां है तेरी, ना माने तो जबर्दस्ती चोद देना.”
खुश होके जब उन्होंने अगला धक्का दिया तो पूरा लंड गाण्ड के अंदर. ‘वो’ मजे से मेरी Clit सहलाते हुए मेरी गाण्ड मारने लगे. अब मुझे भी मस्ती चढ़ने लगी. मैं सिसकियां भरती बोलने लगी, “हाय मुझे उंगली से झाड़ दो….ओह्ह्ह…ओह्ह…मज़ा आ रहा है …ओह्ह्ह…”
उन्होंने कस के Clit को Pinch करते हुए पूछा, “हे पर बोल पहले तेरी बहनों की गाण्ड भी मारूंगा, मंजूर..???”
“हां…हां…ओओह्ह्ह…ओ…हा…अआ…जो चाहो…. बोले तो….. तेरी सालियाँ है जो चाहे करो….जैसे चाहे करो…”
पर अबकी फिर जैसे मैं कगार पे पँहुची उन्होंने हाथ हटा लिया. इसी तरह सारी रात 7-8 बार मुझे किनारे पँहुचा के वो रोक देते, मेरी देह में कम्पन्न चालू हो जाता लेकिन फिर वो कच-कचा के काट लेते.
झडे वो जरूर लेकिन वो भी सिर्फ दो बार. पहली बार मेरी गाण्ड में जब लंड (Penis) ने झड़ना शुरू किया तो उसे निकाल के सीधे मेरी चूची, चेहरे और बालों पे.
बोले, “अपनी पिचकारी से होली खेल रहा हूँ.”
और दूसरी बार एकदम सुबह मेरी गाण्ड में. जब मेरी ननद दरवाजा खटखटा रही थी. उस समय तक रात भर के बाद उनका लंड (penis) पत्थर की तरह सख्त हो चुका था. झुका के कुतिया की तरह करके पहले तो उन्होंने अपना लंड (penis) मेरी गाण्ड में खूब अच्छी तरह फैला के, कस के पेल दिया. फिर जब वो जड़ तक, अंदर तक घुस गया तो मेरे दोनों पैर सिकोड़ के अच्छी तरह चिपका के, कचा-कच, कचा-कच पेलना शुरू कर दिया.
पहले तो मेरे दोनों पैर फैले हुए थे, उसके बीच में उनका पैर, और अब उन्होंने जबरन कस के अपने पैरों के बीच में मेरे पैर सिकोड़ रखे थे. मेरी कसी गाण्ड और सकरी हो गई थी. मुक्के की तरह मोटा उनका लंड (penis) गाण्ड में कसमसा रहा था.
जब मेरी ननद ने दरवाजा खटखटाया, वो एकदम झड़ने के कगार पे थे और मैं भी. उनकी तीन उंगलियां मेरी बुर में और अंगूठा Clit पे रगड़ रहा था.
लेकिन खट-खट की आवाज के साथ उन्होंने मेरी बुर के रस में सनी अपनी उंगलियां निकाल के कस के मेरे मुँह में ठूस दी. दूसरे हाथ से मेरी कमर उठा के सीधे मेरी गाण्ड में झड़ने लगे.
उधर ननद बार-बार दरवाजा खटखटा रही थी और इधर ‘ये’ मेरी गाण्ड में झड़ते जा रहे थे. मेरी गीली प्यासी चूत भी बार-बार फुदक रही थी. जब उन्होंने गाण्ड से लंड निकला तो गाढ़े थक्केदार वीर्य की धार, मेरे चूतडों से होते हुए मेरे जांघ पर……
पर इसकी परवाह किये बिना मैंने जल्दी से सिर्फ चोली पहनी और साड़ी लपेटकर दरवाजा खोल दिया.

बाहर सारे लोग मेरी जेठानी, सास और दोनों ननदें होली की तैयारी के साथ.
“अरे भाभी, ये आप सुबह-सुबह क्या कर….. मेरा मतलब करवा रही थी.? देखिये आपकी सास तैयार है” बड़ी ननद बोली.
(मुझे कल ही बता दिया था कि नई बहु की होली की शुरुआत सास के साथ होली खेल के होती है और इसमें शराफ़त की कोई जगह नहीं होती, दोनों खुल के खेलते है.).
जेठानी ने मुझे रंग पकड़ाया. झुक के मैंने आदर से पहले उनके पैरों में रंग लगाने के लिये झुकी तो जेठानी जी बोली, “अरे आज पैरों में नहीं, पैरों के बीच में रंग लगाने का दिन है.”
और यही नहीं उन्होंने सासु जी का साड़ी साया (Peticot) भी मेरी सहायता के लिये उठा दिया. मैं क्यों चुकती.? मुझे मालूम था की सासु जी को गुद-गुदी लगती है. मैंने हल्के से गुद-गुदी की तो उनके पैर पूरी तरह फ़ैल गए. फिर क्या था.? मेरे रंग लगे हाथ सीधे उनकी जांघ पे. इस उम्र में भी (और उम्र भी क्या.? 40 से कम की ही रही होगी.), उनकी जांघें थोड़ी स्थूल तो थी लेकिन एकदम कड़ी और चिकनी बिलकुल केले के तने जैसी. अब मेरा हाथ सीधे जांघों के बीच में. मैं एक पल सहमी, लेकिन तब तक जेठानी जी ने चढ़ाया, “अरे जरा अपने ससुर जी की कर्मभूमि और पति की जन्म-भूमि का तो स्पर्श कर लो.”
उंगलियां तब तक घुंघराली रेशमी जाटों को छू चुकी थी. (ससुराल में कोई भी Panty नहीं पहनता था, यहाँ तक कि मैंने भी पहनना छोड़ दिया.). मुझे लगा की कहीं मेरी सास बुरा ना मान जाये लेकिन वो तो और खुद बोली, “अरे स्पर्श क्या, दर्शन कर लो बहु.”
और पता नहीं उन्होंने कैसे खिंचा कि मेरा सर सीधे उनकी जांघों के बीच. मेरी नाक एक तेज तीखी गंध से भर गई. जैसे वो अभी-अभी (Bathroom) कर के आयी हो और उन्होंने जब तक मैं सर निकलने का प्रयास करती कस के पहले तो हाथों से पकड़ के फिर अपनी भारी-भारी जांघों से कस के दबोच लिया. उनकी पकड़ उनके लड़के की पकड़ से कम नही थी. मेरे नथुनों में एक तेज महक भर गई और अब वो उसे मेरी नाक और होंठों से हल्के से रगड़ रही थी.
हल्के से झुक के वो बोली, “दर्शन तो बाद में कराउंगी पर तब तक तुम स्वाद तो ले लो थोड़ा…”
जब मैं किसी तरह वहाँ से अपना सर निकल पाई तो वो तीखी गंध अब एकदम मस्त वाली सी तेज, मेरा सर घूम-सा रहा था. एक तो सारी रात जिस तरह उन्होंने तडपाया था, बिना एक बार भी झड़ने दिये और ऊपर से ये.!!! मेरा सर बाहर निकलते ही मेरी ननद ने मेरे होंठों पे एक चांदी का गिलास लगा दिया लबालब भरा, कुछ पीला-सा और होंठ लगते ही एक तेज भभका सा मेरे नाक में भर गया.
“अरे पी ले, ये होली का खास शर्बत है तेरी सास का…. होली की सुबह का पहला प्रसाद…” ननद ने उसे धकेलते हुए कहा. सास ने भी उसे पकड़ रखा था. मेरे दिमाग में कल गुझिया बनाते समय होने वाली बातें आ गई. ननद मुझे चिढ़ा रही थी कि भाभी कल तो खारा शरबत पीना पड़ेगा, नमकीन तो आप है ही, वो पी के आप और नमकीन हो जायेंगी. सास ने चढ़ाया था, “अरे तो पी लेगी मेरी बहु…तेरे भाई की हर चीज़ सहती है तो ये तो होली की रस्म है….”
जेठानी बोली, “ज्यादा मत बोलो, एक बार ये सीख लेगी तो तुम दोनों को भी नहीं छोड़ेगी.”
मेरे कुछ समझ में नही आ रहा था.
मैं बोली, “मैंने सुना है की गाँव में गोबर से होली खेलते है…”
बड़ी ननद बोली, “अरे भाभी गोबर तो कुछ भी नहीं…. हमारे गाँव में तो….”
सास ने इशारे से उसे चुप कराया और मुझसे बोली, “अरे शादी में तुमने पञ्च गव्य तो पिया होगा. उसमे गोबर के साथ गो-मूत्र भी होता है.”
मैं बोली, “अरे गो-मूत्र तो कितनी आयुर्वेदिक दवाओ में पड़ता है….” उसमे मेरी बात काट के बड़ी ननद बोली कि “अरे गो माता है तो सासु जी भी तो माता है और फिर इंसान तो जानवरों से ऊपर ही तो……फिर उसका भी चखने में……”
मेरे ख्यालो में खो जाने से ये हुआ कि मेरा ध्यान हट गया और ननद ने जबरन ‘शरबत’ मेरे ओंठों से नीचे…… सासु जी ने भी जोर लगा रखा था और धीरे-धीरे कर के मैं पूरा डकार गई. मैंने बहुत दम लगाया लेकिन उन दोनों की पकड़ बड़ी तगड़ी थी. मेरे नथुनों में फिर से एक बार वही महक भर गई जो जब मेरा सर उनकी जांघों के बीच में था.
लेकिन पता नहीं क्या था मैं मस्ती से चूर हो गई थी. लेकिन फिर भी मेरे कान में किसी ने कहा, “अरे पहली बार है ना, धीरे-धीरे स्वाद की आदि हो जाओगी… जरा गुझिया खा ले, मुँह का स्वाद बदल जायेगा…”
मैंने भी जिस डब्बे में कल बिना भाँग वाली गुझिया रखी थी, उसमे से निकल के दो खा ली… (वो तो मुझे बाद में पता चला, जब मैं 3-4 निगल चुकी…..कि ननद ने रात में ही डिब्बे बदल दिये थे और उसमे Double Dose वाली भांग की गुझिया थी).
कुछ ही देर में उसका असर शुरू हो गया. जेठानी ने मुझे ललकारा, “अरे रुक क्यों गई.? अरे आज ही मौका है सास के ऊपर चढाई करने का….दिखा दे कि तुने भी अपनी माँ का दूध पिया है…”
और उन्होंने मेरे हाथ में गाढ़े लाल रंग का Pant दे दिया सासु को लगाने को…
“अरे किसके दूध की बात कर रही है.? इसकी पञ्च भतारी, छिनाल, रंडी, हराम चोदी माँ, मेरी समधन की… उसका दूध तो इसके मामा ने, इसके माँ के यारों ने चूस के सारा निकल दिया. एक चूची इसको चुसवाती थी, दूसरी इसके असली बाप, इसके मामा के मुँह में देती थी.”
सास ने गालियों के साथ मुझे चैलेंज किया. मैं क्यों रूकती.? पहले तो लाल रंग मैंने उनके गालों पे और मुँह पे लगाया. उनका आँचल ढलक गया था, चोली से छलकते उनके बड़े-बड़े स्तन….. मुझसे रहा न गया, होली का मौका, कुछ भाँग और उस शरबत का असर, मैंने चोली के अंदर हाथ डाल दिया.
वो क्यों रूकती.? उन्होंने जो मेरी चोली को पकड़ के कस के खिंचा तो आधे हुक टूट गए. मैंने भी कस के उनके स्तनों पे रंग लगाना और मसलना शुरू कर दिया. क्या जोबन थे.? इस उम्र में एकदम कड़े-तनक, गोरे और खूब बड़े-बड़े… कम से कम 38DD रहे होंगे.
मेरी जेठानी बोली, “अरे जरा कस के लगाओ, यही दूध पी के मेरा देवर इतना ताकतवर हो गया है…”
कि रंग लगाते दबाते मैंने भी बोला, “मेरी माँ के बारे में कह रही थी ना, मुझे तो लगता है की आप अभी भी दबवाती, चुसवाती है. मुझे तो लगता है की सिर्फ बचपन में ही नहीं जवानी में भी वो इस दूध को पीते, चूसते रहे है. क्यों है ना..?? मुझे ये शक तो पहले से था की उन्होंने अपनी बहनों के साथ अच्छी Trainning की है लेकिन आपके साथ भी…???”
मेरी बात काट के जेठानी बोली, “तू क्या कहना चाहती है की मेरा देवर माआआ..दर……..”
“जी…. जो आपने समझा कि वो सिर्फ बहनचोद ही नहीं मादरचोद भी है.” मैं अब पुरे मूड में आ गई थी..
“बताती हूँ तुझे…..” कह के मेरी सास ने एक झटके में मेरी चोली खिंच के नीचे फेंक दी और मेरे दोनों ऊरोज सीधे उनके हाथ में.
“बहोत रस है ना तेरी इन चुचियों में, तभी तो सिर्फ मेरा लड़का ही नहीं गाँव भर के मरद बेचारों की निगाह इनपे टिकी रहती है. जरा आज मैं भी तो मज़ा ले के देखूं…” और रंग लगाते-लगाते उन्होंने मेरा Nipple Pinch कर दिया.
“अरे सासु माँ, लगता है आपके लड़के ने कस के चूची मसलना आपसे ही सिखा है. बेकार में मैं अपनी ननदों को दोष दे रही थी. इतना दबवाने, चुसवाने के बाद भी इतनी मस्त है आपकी चूचियां…..” मैं भी उनकी चूची कस के दबाते बोली.
मेरी ननद ने रंग भरी बाल्टी उठा के मेरे ऊपर फेंकी. मैं झुकी तो वो मेरी चचेरी सास और छोटी ननद के ऊपर जा के पड़ी. फिर तो वो और आस-पास की दो-चार औरतें जो रिश्ते में सास लगती थी, मैदान में आ गई. सास का भी एक हाथ सीने से सीधे नीचे, उन्होंने मेरी साड़ी उठा दी तो मैं क्यों पीछे रहती..??? मैंने भी उनकी साड़ी आगे से उठा दी… अब सीधे देह से देह……… होली की मस्ती में चूर अब सास-बहु हम लोग भूल चुके थे. अब सिर्फ देह के रस में डूबे हम मस्ती में बेचैन……… मैं लेकिन अकेले नहीं थी.
जेठानी मेरा साथ देते बोली, “तू सासु जी के आगे का मज़ा ले और मैं पीछे से इनका मज़ा लेती हूँ. कितने मस्त चूतड़ है…? हाय…..”
कस कस के रंग लगाती, चूतड़ मसलती वो बोली, “अरे तो क्या मैं छोड़ दूंगी इस नए माल के मस्त चूतडो को…..??? बहोत मस्त गाण्ड है. एकदम गाण्ड मराने में अपनी छिनाल, रंडी माँ को गई है लगता है. ज़रा देखू गाण्ड के अंदर क्या माल है.??” ये कह के मेरी सास ने भी कस के मेरे चूतडो को भींचा और रंग लगाते, दबाते, सहलाते, एक साथ ही दो उंगलियां मेरी गाण्ड में गचाक से पेल दी.
“उईई माँ…..” मैं चीखी पर सास ने बिना रुके सीधे जड़ तक घुसेड़ के ही दम लिया. तब तक मेरी एक चचेरी सास ने एक गिलास मेरे मुँह में, वहीं तेज वैसी ही महक, वैसा ही रंग. लेकिन अब कुछ भी मेरे बस में नहीं था. दो सासुओं ने कस के दबा के मेरा मुँह खोल दिया और चचेरी सास ने पूरा गिलास खाली कर के दम लिया और बोली, “अरे मेरा खारा शरबत तो चख…”
फिर उसी तरह दो-तीन गिलास और…..
उधर मेरे सास के एक हाथ की दो उंगलियां गोल-गोल कस के मेरी गाण्ड में घुमती, अंदर-बाहर होती और दूसरे हाथ की दो उंगलियां मेरी बुर में…………. मैं कौनसी पीछे रहने वाली थी.? मैंने भी तीन उंगलियां उनकी बुर में…… वो अभी भी अच्छी-खासी Tight थी.
“मेरा लड़का बड़ा ख्याल रखता है तेरा बहु… पहले से ही तेरी पिछवाड़े की कुप्पी में मक्खन मलाई भर रखा है, जिससे मरवाने में तुझे कोई दिक्कत ना हो.” वो कस के गाण्ड में उँगली करती बोली.

होली अच्छी-खासी शुरू हो गई थी.

“अरे भाभी, आपने सुबह उठ के इतने गिलास शरबत गटक लिये, गुझिया भी गपाक ली लेकिन मन्जन तो किया ही नहीं.”
“आप क्यों नहीं करवा देती.???” अपनी माँ को बड़ी ननद ने उकसाया.
“हां…हां…क्यों नहीं…मेरी प्यारी बहु है…” और गाण्ड में पूरी अंदर तक 10 मिनट से मथ रही उंगलियों को निकल के सीधे मेरे मुँह में, कस-कस के वो मेरे दांतों पे और मुँह पे रगडती रही. मैं छटपटा रही थी लेकिन सारी औरतो ने कस के पकड़ रखा था. और जब उनकी उँगली बाहर निकली तो फिर वही तेज भभक मेरे नथुनों में…. अबकी जेठानी थी.
“अरे तुने सबका शरबत पिया तो मेरा भी तो चख ले…”
पर बड़ी ननद तो उन्होंने बचा हुआ सीधा मेरे मुँह पे, “अरे भाभी ने मन्जन तो कर लिया अब जरा मुँह भी तो धो ले…”
घन्टेभर तक वो औरतो, सासुओं के साथ और उस बीच सब शरम-लिहाज…. मैं भी जम के गालियाँ दे रही थी. किसी की चुत, गाण्ड मैंने नहीं छोड़ी और किसी ने मेरी नहीं बख्शी…..

घन्टेभर तक वो औरतो, सासुओं के साथ और उस बीच सब शरम-लिहाज…. मैं भी जम के गालियाँ दे रही थी. किसी की चुत, गाण्ड मैंने नहीं छोड़ी और किसी ने मेरी नहीं बख्शी…..

उनके जाने के बाद थोड़ी देर हमने साँस ली ही थी कि गाँव की लड़कियों का हुजूम……
मेरी ननदें सारी….14 से 24 साल तक ज्यादातर कुँवारी…. कुछ चुदी, कुछ अनचुदी….कुछ शादी-शुदा, 1-2 तो बच्चों वाली भी……कुछ देर में जब आई तो मैं समझ गई कि असली दुर्गत अब हुई. एक से एक गालियां गाती, मुझे छेड़ती, “भाभी, भैया के साथ तो रोज मजे उड़ाती हो….आज हमारे साथ भी….”
ज्यादातर साड़ीयों में, 1-2 जो कुछ छोटी थी फ्रोक में और 3-4 सलवार में भी…. मैंने अपने दोनों हाथों में गाढ़ा बैंगनी रंग पोत के रखा था और साथ में पेन्ट, वार्निश, गाढ़े पक्के रंग सब कुछ……
एक खम्भे के पीछे छिप गई मैं, ये सोच के कि कम से कम 1-2 को तो पकड़ के पहले रगड़ लुंगी. तब तक मैंने देखा कि जेठानी ने एक पड़ोस की ननद को (मेरी छोटी बहन छुटकी से भी कम उम्र की लग रही थी, उभार थोड़े-थोड़े बस गदरा रहे थे, कच्ची कली) उन्होंने पीछे से जकड़ लिया और जब तक वो सम्भले-सम्भले लाल रंग उसके चेहरे पे पोत डाला. कुछ उसके आँख में भी चला गया और मेरे देखते-देखते उसकी फ्रोक गायब हो गई और वो Bra-Panty में………..
जेठानी जी ने झुका के पहले तो ब्रा के ऊपर से उसके छोटे-छोटे अनार मसले. फिर panty के अंदर हाथ डाल के सीधे उसकी कच्ची कली को रगड़ना शुरू कर दिया. वो थोड़ा चिचियाई तो उन्होंने कस के दो हाथ उसके छोटे-छोटे कसे चूतडों पे मारे और बोली, “चुपचाप होली का मज़ा ले…….”
फिर से Panty में हाथ डाल के, उसके चूतडो पे, आगे जांघों पे और जब उसने सिसकी भरी तो मैं समझ गई कि मेरी जेठानी की उँगली कहाँ घुस चुकी है..??? मैंने थोड़ा-सा खम्भे से बाहर झाँक के देखा, उसकी कुँवारी गुलाबी कसी चुत को जेठानी की उँगली फैला चुकी थी और वो हल्के-हल्के उसे सहला रही थी…..
अचानक झटके से उन्होंने उँगली की टिप उसकी चूत में घुसेड़ दी. वो कस के चीख उठी.
“चुप….साली…..” कस के उन्होंने उसकी चूत पे मारा और अपनी चूत उसके मुँह पे रख दी…. वो बेचारी मेरी छोटी ननद चीख भी नहीं पाई……
“ले चाट चूत……चाट…कस-कस के……” वो बोली और रगड़ना शुरू कर दिया.. मुझे देख के अचरज हुआ कि उस साल्ली चुत मराणो मेरी ननद ने चूत चाटना भी शुरू कर दिया. वो अपने रंग लगे हाथों से कस के उसकी छोटी चुचियों को रगड़, मसल भी रही थी. कुछ रंग-रगड़ से चुचियाँ एकदम लाल हो गई थी. तब हल्की-सी धार की आवाज ने मेरा ध्यान फिर से चेहरे की ओर खीचा. मैं दंग रह गई…….
“ले पी….ननद…साल्ली….होली का शरबत….ले……एकदम से जवानी फुट पड़ेगी….नमकीन हो जायेगी ये नमकीन शरबत पी के……” जेठानी बोल रही थी.
एकदम गाढ़े पीले रंग की मोटी धार……चार-चार…..सीधे उसके मुँह में…. वो छटपटा रही थी लेकिन जेठानी की पकड़ भी तगड़ी थी…. सीधा उसके मुँह में……. जिस रंग का शरबत मुझे जेठानी ने अपने हाथों से पिलाया था, बिल्कुल उसी रंग का वैसा ही और उस तरफ देखते समय मुझे ध्यान नहीं रहा कि कब दबे पांव मेरी चार गाँव की ननदें मेरे पीछे आ गई और मुझे पकड़ लिया.
उसमे सबसे तगड़ी मेरी शादी-शुदा ननद थी, मुझसे थोड़ी बड़ी बेला. उसने मेरे दोनों हाथ पकड़े और बाकी ने टाँगे. फिर गंगा डोली करके घर के पीछे बनी एक कुण्डी में डाल दिया. अच्छी तरह डूब गई मैं रंग में. गाढ़े रंग के साथ कीचड़ और ना जाने क्या-क्या था उसमे.? जब मैं निकलने की कोशिश करती २-४ ननदें उसमे जो उतर गई थी, मुझे फिर धकेल दिया… साड़ी तो उन छिनालों ने मिल के खींच के उतार ही दी थी. थोड़ी ही देर में मेरी पूरी देह रंग से लथ-पथ हो गई. अबकी मैं जब निकली तो बेला ने मुझे पकड़ लिया और हाथ से मेरी पूरी देह में कालिख रगड़ने लगी. मेरे पास कोई रंग तो वहाँ था नहीं तो मैं अपनी देह से ही उस पे रगड़ के अपना रंग उस पे लगाने लगी.
वो बोली, “अरे भाभी, ठीक से रगड़ा-रगड़ी करों ना…..देखो में बताती हूँ तुम्हारे ननदोई कैसे रगड़ते है…!!?!!” और वो मेरी चूत पे अपनी चूत घिसने लगी. मैं कौन-सी पीछे रहने वाली थी.? मैंने भी कस के उसकी चूत पे अपनी चूत घिसते हुए बोला, “मेरे सैया और अपने भैया से तो तुमने खूब चुदवाया होगा, अब भौजी का भी मज़ा ले ले…..”
उसके साथ-साथ लेकिन मेरी बाकी ननदें….. आज मुझे समझ में आ गया था कि गाँव में लड़कियाँ कैसे इतनी जल्दी जवान हो जाती है तथा उनके चूतड़ और चुचियाँ इतनी मस्त हो जाती है…. छोटी-छोटी ननदें भी कोई मेरे चूतड़ मसल रहा था तो कोई मेरी चुचियाँ लाल रंग लेके रगड़ रहा था……
थोड़ी देर तक तो मैंने सहा फिर मैंने एक की कसी कच्ची चूत में उँगली ठेल दी…………

थोड़ी देर तक तो मैंने सहा फिर मैंने एक की कसी कच्ची चूत में उँगली ठेल दी………………………

चीख पड़ी वो…. मौका पा के मैं बाहर निकल आई लेकिन वहाँ मेरी बड़ी ननद दोनों हाथों में रंग लगाए पहले से तैयार खड़ी थी. रंग तो एक बहाना था. उन्होंने आराम से पहले तो मेरे गालों पे फिर दोनों चुचियों पे खुल के कस के रंग लगाया, रगड़ा….. मेरे अंग-अंग में रोमांच दौड़ गया. बाकी ननदों ने पकड़ रखा था इसलिए मैं हिल भी नही पा रही थी…. चुचियाँ रगड़ने के साथ उन्होंने कस के मेरे Nipples भी Pinch कर दिये और दूसरे हाथ से रंग सीधे मेरे Clit पे. बड़ी मुश्किल से मैं छुड़ा पाई……
लेकिन उसके बाद मैंने किसी भी ननद को नही बख्शा….. सबके उँगली की… चुत में भी और गाण्ड में भी….. लेकिन जिसको मैं ढूँढ रही थी वो नही मिली, मेरी छोटी ननद…. मिली भी तो मैं उसे रंग लगा नही पाई…. वो मेरे भाई के कमरे की तरह जा रही थी…. पूरी तैयारी से, होली खेलने की…….
दोनों छोटे-छोटे किशोर हाथों में गुलाबी रंग, पतली कमर में रंग, पेन्ट और वार्निश के पाऊच….. जब मैंने पकड़ा तो वो बोली, “Please भाभी, मैंने किसी से Promise किया है कि सबसे पहले उसी से रंग डलवाउंगी…… उसके बाद आपसे… चाहे जैसे, चाहे जितना लगाईयेगा, मैं चु भी नही करुँगी…..”
मैंने छेड़ा, “ननद रानी, अगर उसने रंग के साथ कुछ और भी डाल दिया तो……..???”
वो आँख नचा के बोली, “तो डलवा लूँगी भाभी, आखिर कोई ना कोई कभी ना कभी तो……. फिर मौका भी है, दस्तूर भी है…..”
“एकदम” उसके गाल पे हल्के से रंग लगा के मैं बोली और कहा, “जाओ, पहले मेरे भैया से होली खेल आओ, फिर अपनी भौजी से………….” थोड़ी देर में ननदों के जाने के बाद गाँव की औरतों, भाभियों का झुण्ड आ गया और फिर तो मेरी चांदी हो गई……….
हम सब ने मिल के बड़ी ननदों को दबोचा और जो-जो उन्होंने मेरे साथ किया था वो सब सूद समेत लौटा दिया…… मज़ा तो मुझे बहुत आ रहा था लेकिन सिर्फ एक Problem थी…..
मैं झड़ नही पा रही थी….. रात भर ‘इन्होने’ रगड़ के चोदा था लेकिन झड़ने नही दिया था….. रात भर से मैं तड़प रही थी. और फिर सुबह-सुबह सासु जी की उंगलियों ने भी आगे-पीछे दोनों ओर, लेकिन जैसे ही मेरी देह कांपने लगी, मैंने झड़ना शुरू ही किया था कि वो रुक गई ओर पीछे वाली उँगली से मुझे मंझन कराने लगी. मेरा झड़ना उस वक्त रुक गया था. उसके बाद तो सब कुछ छोड़ के वो मेरी गाण्ड के पीछे ही पड़ गई थी……
यही हालत बेला और बाकी सभी ननदों के साथ हुई…. बेला कस कस के घिस्सा दे रही थी और मैं उसकी चुचियाँ पकड़ के कस-कस के चुत पे चुत रगड़ रही थी…. लेकिन फिर मैं जैसे ही झड़ने के कगार पे पहुँची कि बड़ी ननद आ गई…. और इस बार भी मैंने ननद जी को पटक दिया था और उनके ऊपर चढ़ के रंग लगाने के बहाने उनकी चुचियाँ खूब जम के रगड़ रही थी और कस-कस के चुत रगड़ते हुए बोल रही थी, “देख ऐसे चोदते है तेरे भैया मुझको..!?!”
चूतड़ उठा के मेरी चूत पे अपनी चूत रगडती वो बोली, “और ऐसे चोदेंगे आपको आपके ननदोई..!?!”
मैंने कस के Clit से उसकी Clit रगड़ी और बोला, “अरे तो डरती हूँ क्या उस साले भडवे से..??? उसके साले से रोज चुदती हूँ, आज उसके जीजा साले से भी चुदवा के देख लूंगी.”
मेरी देह उत्तेजना के कगार पर थी, लेकिन तब तक मेरी जेठानी आ के शामिल हो गई और बोली, “हाय तू अकेले मेरी ननद का मज़ा ले रही है, ज़रा मुझे भी मस्ती करने दे मेरी प्यारी छिनाल ननद के साथ.” और मुझे हटा के वो चढ़ गई.
मैं इतनी गरम हो चुकी थी कि मेरी सारी देह कांप रही थी. मन कर रहा था कि कोई भी आ कर चोद दे. बस किसी तरह एक लंड मिल जाए, किसी का भी. फिर तो मैं उसे छोडती नहीं. निचोड़ के खुद झड़ के ही दम लेती……………..

इसी बीच मैं अपने भाई के कमरे की ओर भी एक चक्कर लगा आई थी. उसकी और मेरी छोटी ननद के बीच होली जबर्दस्त चल रही थी. उसकी पिचकारी मेरी ननद ने पूरी की पूरी घोंट ली थी. चींख भी रही थी, सिसक भी रही थी, लेकिन उसे छोड़ भी नहीं रही थी.
तब तक गाँव की औरतों के आने की आहट पाकर मैं चली गई.
जब बाकि औरतें चली गई तो भी एक-दो मेरे जो रिश्ते की जेठानी लगती थी, रुक गई. हम सब बाते कर रहे थे तभी छोटी ननद की किस्मत वो कमरे से निकल के सीधे हमीं लोगों की तरफ़ आ गई. गाल पे रंग के साथ-साथ हल्के-हल्के दांत के निशान, टांगे फैली-फैली, चेहरे पर मस्ती, लग रहा था पहली चुदाई के बाद कोई कुंवारी आ रही है. जैसे कोई हिरनी शिकारियों के बीच आ जाए वही हालत उसकी थी. वो बिदकी और मुड़ी, तो मेरी दोनों जेठानियो ने उसे खदेड़ा और जब वो सामने की ओर आई तो वहाँ मैं थी. मैंने उसे एक झटके में दबोच लिया. वो मेरी बाहों में छटपटाने लगी, तब तक पीछे से दोनों जेठानियो ने पकड़ लिया ओर बोली, “हाय.! कहा से चुदा के आ रही है..???”
दुसरी ने गाल पे रंग मलते हुए कहा, “चल, अब भौजियो से चुदा. एक-एक पे तीन-तीन.” ओर एक झटके में उसकी चोली फाड़ के खींच दी. जो जोबन झटके से बाहर निकले वो अब मेरी मुट्ठी में कैद थे.
“अरे तीन-तीन नहीं चार-चार.” तब तक मेरी जेठानी भी आ गई ओर हँस के वो बोली और उसको पूरी नंगी करके कहा, “अरे होली ननद से खेलनी है, उसके कपड़ो से थोड़े ही.”
फिर क्या था थोड़ी ही देर में वो नीचे और मैं ऊपर. रंग, pant, varnish और कीचड़ कोई चीज़ हम लोगों ने नही छोड़ी…. लेकिन ये तो शुरुआत थी.

लेकिन ये तो शुरुआत थी………….

मैं अब सीधे उसके ऊपर चढ़ गई और और अपनी प्यासी चूत उसके किशोर, गुलाबी, रसीले होंठों पे रगड़ने लगी. वो भी कम चुदक्कड नहीं थी, चाटने और चुसने में उसे भी मज़ा आ रहा था. उसके जीभ की नोंक मेरे Clit (चूत का लहसुन) को छेड़ती हुई मेरे पेशाब के छेद को छू गई. और मेरे पूरे बदन में सुरसुरी मच गई. मुझे वैसे भी बहुत कस के लगी थी, सुबह से 5-6 गिलास शरबत पी कर और फिर सुबह से की भी नहीं थी.
(मुझे याद आया कि कल रात मेरी ननद ने छेड़ा था कि भाभी आज निपट लीजिए, कल होली के दिन Toilet में सुबह से ही ताला लगा दूंगी. और मेरे बिना पूछे बोला कि अरे यही तो हमारे गाँव की होली की…खास कर नई बहु के आने पे होने वाली होली की spaciality है. जेठानी और सास दोनों ने आँख तर्रेर कर उसे मना किया और वो चुप हो गई.)
मेरे उठने की कोशिश को दोनों जेठानियो ने बेकार कर दिया और बोली, “हाय, आ रही है तो कर लो ना…इतनी मस्त ननद है…और होली का मौका…ज़रा पिचकारी से रंग की धार तो बरसा दो…छोटी प्यारी ननद के ऊपर.”
मेरी जेठानी ने कहा, “और वो बेचारी तेरी चूत की इतनी सेवा कर रही है…तू भी तो देख ज़रा उसकी चूत ने क्या-क्या मेवा खाया है..???”
मैंने गप्प से उसकी चूत में मोटी उंगली घुसेड़ दी. मेरी छोटी छिनाल ननद सीत्कार उठी. उसकी चूत लस-लसा रही थी. मेरी दुसरी उंगली भी अंदर हो गई. मैंने दोनों उंगलिया उसकी चूत से निकाल के मुँह में डाल ली.. वाह क्या गाढ़ी मक्खन-मलाई थी..?? एक पल के लिये मेरे मन में ख्याल आया कि मेरी ननद की चूत में किसका लंड अभी गया था.? लेकिन सर झटक के मैं मलाई का स्वाद लेने लगी. वाह क्या स्वाद था.? मैं सब कुछ भूल चुकी थी कि तब तक मेरी शरारती जेठानियो ने मेरे सुर्सुराते छेद को छेड दिया और बिना रुके मेरी धार सीधे छोटी ननद के मुँह में….
दोनों जेठानियो ने इतनी कस के उसका सर पकड़ रखा था कि वो बेचारी हिल भी नहीं सकती थी और एक ने मुझे दबोच रखा था. थोड़ी देर तो मैंने भी हटने की कोशिश की लेकिन मुझे याद आया कि अभी थोड़ी देर पहले ही, मेरी जेठानी पड़ौस की उस ननद को…… और वो तो इससे भी कच्ची थी.
“अरे होली में जब तक भाभी ने पटक के ननद को अपना खास असल खारा शरबत नहीं पिलाया, तो क्या होली हुई..???” एक जेठानी बोली.
दुसरी बोली, “तू अपनी नई भाभी की चूत चाट और उसका शरबत पी और मैं तेरी कच्ची चूत चाट के मस्त करती हूँ.”
मैं मान गई अपनी ननद को, वास्तव में धार के बावजूद वो चाट रही थी. इतना अच्छा लग रहा था कि मैंने उसका सर कस के पकड़ लिया और कस-कस कर अपनी बुर उसके मुँह पे रगड़ने लगी. मेरी धार धीरे-धीरे रुक गई और मैं झड़ने के कगार पर थी कि मेरी एक जेठानी ने मुझे खींच के उठा दिया. लेकिन मौके का फायदा उठा के मेरी ननद निकल भागी और दोनों जेठानिया उसके पीछे.

मैं अकेले रह गई थी. थोड़ी देर मैं सुस्ता रही थी कि ‘उईईईई’ की चीख आई, उस तरफ़ से जिधर मेरे भाई का कमरा था. मैं उधर दौड़ के गई. मैं देख के दंग रह गई. उसकी Half-Pent घुटनों तक नीचे सरकी हुई और उसके चूतडों के बीच में ‘वो’.
‘इनका’ मोटा लाल गुस्साया सुपाड़ा पूरी तरह उसकी गाण्ड में पैबस्त… वो बेचारा अपने चूतड़ पटक रहा था लेकिन मैं अपने experience से अच्छी तरह समझ गई थी कि अगर एक बार सुपाड़ा घुस गया तो ये बेचारा लाख कोशिश कर ले ‘इनका’ मुसल बाहर नहीं निकलने वाला. उसकी चीख अब गों-गों की आवाज़ में बदल गई थी. उसके मुँह की ओर मेरा ध्यान गया तो ननदोई ने अपना लंड उसके मुँह में ठेल रखा था. लम्बाई में भले वो ‘मेरे इनसे’ 19 हो लेकिन मोटाई में तो उनसे भी कहीं ज्यादा, मेरी मुट्ठी में भी मुश्किल से समा पाता.
मेरी नज़र सरक कर मेरे भाई के शिश्न पर पड़ी. बहुत प्यार, सुन्दर-सा गोरा, लम्बाई में तो वो ‘मेरे उनके’ और ननदोई के लंड के आगे कही नहीं टिकता, लेकिन इतना छोटा भी नहीं, कम से कम 6 inch का तो होगा ही, छोटे केले की तरह और एकदम कड़ा…..
गाण्ड में मोटा लंड मिलने का उसे भी मज़ा मिल रहा था. ये पता इसी से चल रहा था. वो उसके केले को मुट्ठिया रहे थे और उसका लिची जैसा गुलाबी सुपाड़ा खुला हुआ बहुत प्यारा लग रहा था. बस मन कर रहा था कि गप्प से मुँह में ले लूँ और कस-कस कर दो-चार चुप्पे मार लूँ. मेरे मुँह में फिर से वो स्वाद आ गया जो मेरी छोटी ननद के बुर में उंगलियां निकाल के चाटते समय मेरे मुँह में आया था. अगर अभी वो मिल जाती तो सच में बिना चुसे ना छोडती.
मैं उस समय इतनी चुदासी हो रही थी कि बस…..
“पी साले पी…. अगर मुँह से नहीं पिएगा तो तेरी गाण्ड में डाल के ये बोतल खाली कराएँगे.”
ननदोई ने दारू की बोतल सीधे उसके मुँह में लगा के उड़ेल दी. वो घुटुर-घुटुर कर के पी रहा था. कड़ी महक से लग रहा था कि ये देसी दारू की बोतल है. उसका मुँह तो बोतल से बंद था ही, ‘इन्होने’ एक-दो और धक्के कस के मारे. बोतल हटा के ननदोई ने एक बार फिर से उसके गोरे-गोरे कमसिन गाल सहलाते हुए फिर अपना तन्नाया लंड उसके मुँह में घुसेड़ दिया.
‘इन्होने’ आँख से ननदोई जी को इशारा किया, मैं समझ गई कि क्या होने वाला है.? और वही हुआ.
ननदोई ने कस के उसका सर पकड़ा और मोटा लंड पूरी ताकत से अंदर पेल के उसका मुँह अच्छी तरह बंद कर दिया और मजबूती से उसके कंधे को पकड़ लिया. उधर ‘इन्होने’ भी उसका शिश्न छोड़ के दोनों हाथों से कमर पकड़ के वो करारा धक्का लगाया कि दर्द के मारे वो बिलबिला उठा. बेचारा घूं-घूं के सिवाय कुछ न क सका. लेकिन बिना रुके एक के बाद एक ‘ये’ कस-कस के पलते रहे. उसके चेहरे का दर्द… आँखों में बेचारे के आँसू तैर रहे थे. लेकिन मैं जानती थी कि ऐसे समय रहम दिखाना ठीक नहीं और ‘इन्होंने’ भी Almost पूरा लौड़ा उसकी कसी गाण्ड में ठूस दिया.
वो छटपटाता रहा, गाण्ड पटकता रहा, घूं-घूं करता रहा लेकिन बेरहमी से वो ठेलते रहे. मोटा लंड मुँह में होने से उसके गाल भी पुरे फुले और आँखे तो मानो निकल पड़ रही थी.
“बोल साल्ले, मादरचोद, तेरी बहन की माँ का भोसड़ा मारूं……… बोल मज़ा आ रहा है गाण्ड मराने में…???” उसके चूतड़ पे धौल जमाते हुए ‘ये’ बोले.
ननदोई जी ने एक पल के लिए अपना लंड बाहर निकाल लिया और वो भी हँस के बोले, “Idea अच्छा है…… तेरी सास बड़ी मस्त माल है….. क्या चुचियाँ है उसकी..!!!! पूछ इस साले से चुदवायेगी वो..??? साईज क्या है उस छिनाल की चुचियों की..???”
“बोल साले, क्या साईज है उस की चुचियों की.?? माल तो बिंदास है….” उसके बाल खींचते हुए ‘इन्होने’ उसके गाल पे एक आँसू चाट लिया और कच-कचा के गाल काट लिया…..
“38 DD” वो बोला.
“अबे भोसड़ी के, क्या 38 DD.?? साफ-साफ बोल…..” उसके गाल पे अपने लंड से सटासट मारते ननदोई जी बोले…..
“सीना…..छाती……चूची……” वो बोला.
“सच में..?? जैसे तेरी कसी गाण्ड मारने में मज़ा आ रहा है वैसे उस की भी बड़ी-बड़ी चुचियाँ पकड़ के मस्त चूतडों के बीच……… हाए क्या गाण्ड है.?? बहोत मज़ा आएगा……!!!” ‘ये’ बोले और बचा-कुचा लंड भी ठेल दिया. मेरे छोटे भाई की तो चीख ही निकल गई……
मैं सोच रही थी कि तो क्या मेरी माँ के साथ भी….. छी कैसा-कैसा सोचते है ये..??? वैसे ये बात सही भी थी कि मेरी माँ की चुचियाँ और चूतड़ बहुत मस्त थे, और हम सब बहने बहुत कुछ उनपे गई थी. वैसे भी बहुत दिन हो गए होंगे, उनकी बुर को लंड खाए हुए.
“क्या मस्त गाण्ड मराता है तू यार…… मजा आ गया. बहुत दिन हो गए ऐसी मस्त गाण्ड मारे हुए.” हल्के-हल्के गाण्ड मरते हुए ‘ये’ बोले.
ननदोई जी कभी उसे चुम रहे थे तो कभी उससे अपना सुपाड़ा चुसवा-चटवा रहे थे. उन्होंने पूछा, “क्या हुआ जो तुझे इस साले की गाण्ड में ये मज़ा आ रहा है.???”
वो बोले, “अरे इसकी गाण्ड, जैसे कोई कोई हाथ से लंड को मुट्ठीयाते हुए दबाए, वैसे लंड को भींच रही है. ये साला Natural गाण्डू है” और एक झटके में सुपाड़े तक लंड बाहर कर के सटा-सट गपा-गप उसकी गाण्ड मारना शुरू कर दिया.
मैंने देखा कि जब उनका लंड बाहर आता तो ‘इनके’ मोटे मुसल पे उसकी गाण्ड का मसाला….. लेकिन मेरी नज़र सरक के उसके लंड पे जा रही थी. सुन्दर सा प्यारा, कड़ा, कभी मन करता था कि सीधे मुँह में ले लु तो कभी चूत में लेने का.
तभी सुनाई पड़ा. ‘ये’ बोल रहे थे, “साले, आज के बाद से कभी मना मत करना गाण्ड मराने के लिए, तुझे तो मैं अब पक्का गाण्डू बना दूँगा और कल होली में तेरी सारी बहनों की गाण्ड मारूंगा, चूत तो चोदुंगा ही. तुझे तेरी कौन छिनाल बहन पसंद है.? बोल साले.. इस गाण्ड मराने के लिये तुझे अपनी साली ईनाम में दूँगा.”
मैंने मन में कहा कि ईनाम में तो वो ‘इनकी’ छोटी बहन की मस्त कच्ची चूत कि seal सुबह ही खोल चुका है.
वो बोला, “सबसे छोटी वाली…लेकिन अभी वो छोटी है.”
“अरे उसकी चिन्ता तू छोड़. चोद-चोद कर इस होली के मौके पे तो मैं उसकी चूत का भोसड़ा बना दूँगा और अपनी सारी सालियों को रंडी की तरह चोदुंगा. चल तू भी क्या याद रखेगा.? सारी तेरी बहनों को तुझसे चुदवा के तुझे गाण्डू के साथ नम्बरी बहनचोद भी बना दूँगा.”
उन लोगों ने तो बोतल पहले ही खाली कर दी थी. ननदोई उसे भी आधी से ज्यादा देसी बोतल पिला के खाली कर चुके थे और वो भी नशे में मस्त हो गया था.

“अरे कहा हो..???”तब तक जेठानी की आवाज़ गूंजी.

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